काठमांडू। प्रतिनिधि सभा की आज हुई बैठक में सांसदों ने बलात्कारियों को फांसी की सजा देने के लिए कानून बनाने की मांग की है।
उनका तर्क है कि हालांकि यह संविधान और मानवाधिकारों पर नेपाल की प्रतिबद्धताओं के विपरीत है, लेकिन संसद के पास उन्हें तोड़ने की शक्ति होनी चाहिए। बारा में तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या की घटना को याद करते हुए सांसदों ने समय के अनुसार अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बारा में एक बच्ची की हत्या को लेकर दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया और संसद तक तेज हो गई है। गृह मंत्री सुधन गुरुंग, कानून मंत्री सोबिता गौतम और पांच अन्य मंत्रियों ने आधी रात को पीड़ित परिवार के साथ तीन सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के अनुसार, मौजूदा कानूनों में सजा के प्रावधानों की समीक्षा करने और सुझाव देने के लिए सात सदस्यीय न्यायिक समाधान समिति के गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।
कानून, न्याय और संसदीय कार्य मंत्री सोबिता गौतम ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि नेपाल के संविधान का अनुच्छेद 16920 मौत की सजा देने वाले कानून बनाने पर रोक लगाता है। हालांकि, कानून के जानकारों का कहना है कि समस्या सजा के प्रावधान में नहीं बल्कि पुलिस की खराब जांच और प्रवर्तन में है।
आपराधिक संहिता की धारा 41 (एफ) के अनुसार, बलात्कार के बाद हत्या के दोषी व्यक्ति को जीवित रहने तक आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है। कुछ कानूनों में और सुधार और मौजूदा कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन से बलात्कार की घटनाओं को कम किया जा सकता है या अपराधी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान सजा पर्याप्त है, लेकिन पुलिस जांच में विशेषज्ञता और संवेदनशीलता की कमी और अभियोजकों में विश्वास की कमी मुख्य चुनौतियां हैं। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि पीड़ितों को न्याय देने का सही तरीका सख्त कानून की मांग करने के बजाय जांच प्रक्रिया को कुशल और निष्पक्ष बनाना है

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