काठमांडू। सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें अदालत द्वारा दोषी ठहराए बिना आपराधिक अपराधों के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों को सार्वजनिक करने और दबाव में बयान लेने के फैसले को चुनौती दी गई है।
अधिवक्ता कुमार प्रसाद थपलिया ने नेपाल सरकार और नेपाल पुलिस मुख्यालय को प्रतिवादी नामित करते हुए रिट याचिका दायर की। अदालत ने याचिका पर सुनवाई के लिए 26 अप्रैल की तारीख तय की है।
रिट याचिका में दावा किया गया है कि नेपाल की वर्तमान आपराधिक न्याय प्रणाली में गंभीर विसंगतियां आ गई हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि पुलिस की कार्यशैली, जो गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी का नाम, उपनाम, फोटो और वीडियो सार्वजनिक करती है, ने सीधे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।
रिट याचिका में दावा किया गया है कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी को सार्वजनिक करते समय गरिमा के साथ जीने का अधिकार, निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, निजता का अधिकार और संविधान द्वारा प्रदत्त यातना के खिलाफ अधिकार को ठेस पहुंची है। याचिका में कहा गया है, ‘गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपराधी के रूप में पेश करने से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक स्थिति और पारिवारिक संबंधों पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
संविधान का अनुच्छेद 20 (5) किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माने जाने का अधिकार देता है। हालांकि, अगर पुलिस जांच के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है तो यह मीडिया ट्रायल होगा और कोर्ट के फैसले से पहले व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को खत्म कर दिया जाएगा।
रिट याचिकाकर्ता थपलिया ने दावा किया है कि इस तरह के कृत्य अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों, विशेष रूप से आईसीसीपीआर और कैट का भी उल्लंघन करते हैं। इससे पहले, याचिकाकर्ता ने सुधार की मांग करते हुए गृह मंत्रालय में एक आवेदन दायर किया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
याचिका में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से परमादेश आदेश देने की मांग की है कि दोषी साबित होने तक गिरफ्तार लोगों को सार्वजनिक न किया जाए, जांच के दौरान प्रताड़ना का इस्तेमाल न किया जाए और जबरन दिए गए बयान को सबूत के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए।
एडवोकेट थपलिया ने रिट याचिका में कहा है कि उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा क्योंकि सरकार के 100 सूत्री एजेंडे में मानवाधिकार के गंभीर मुद्दे शामिल नहीं थे।

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